स्त्री अस्मत और अस्मिता हमारे आज और समाज के ज्वलंत विषय हैं । स्त्री की
अस्मिता को लेकर नाना प्रकार की चर्चाएं हो रही हैं । स्त्री की अस्मत को
बचाने के प्रयासों पर विचार किये जा रहे हैं । ऑटो रिक्शा में जीपीएस
सिस्टम लगाये गए हैं, महिला सुरक्षा टोल फ्री नंबर बनाये गए हैं , सीधे
मुख्यमंत्री से बातचीत की सुविधा दी गई है
, किन्तु स्त्री की अस्मत और अस्मिता से जुड़े बुनियादी सवालों पर बात किये
बिना ये सब कार्यवाहियां मजाक सी लगती हैं ।
आज हम स्त्री
सशक्तिकरण , स्त्री शिक्षा , महिला आरक्षण पर बात तो कर रहे हैं । महिलाओं पर
विचार करते हुए हम उस चौराहे तक आ पहुंचे हैं जहाँ महिलाओं से जुड़े नाना
संकटपूर्ण प्रश्न मुहँ बाए खड़े हैं । आज इन सभी प्रश्नों के चक्रव्यूह में
फसने की बजाये ज़रुरत इस बात की है कि हमें अपने समाज और समय की आवश्यकता को
पहचानते हुए स्त्री सम्बन्धी मूलभूत प्रश्नों की पड़ताल करनी होगी ।
जब भारतीय सन्दर्भों
में हम स्त्री प्रश्नों की बात करते हैं तो हमें भारतीय समाज और सामाजिक
ढाँचे को ध्यान में रखना होगा । यहाँ महिला सशक्तिकरण का अर्थ केवल महिला
की पुरुष से या परिवार से मुक्ति नहीं हो सकता । भारत में परिवार एक मूलभूत
, मज़बूत और महत्वपूर्ण इकाई है , इसीलिए भारतीय सन्दर्भों में महिला
सम्बन्धी प्रश्नों पर बात करते हुए हमें परिवार के भीतर रहने वाली स्त्री
के सवालों को भी विचारना होगा । अर्नाल्ड वेस्कर के नाटक फॉर सीजंस की
नायिका बिएट्रिस के शब्दों में कहें तो -- "सुकून , इज्ज़त और हिम्मत ' इन
तीनों के लिए तरसती रही मैं ।" परिवार में रहने वाली स्त्री से जुड़े इन
बुनियादी सवालों पर विचार करना होगा । घर की चौहद्दियों को तोड़कर नहीं उसके
भीतर भी स्त्री की मुक्ति पर बात करनी होगी ।
वास्तव में स्त्री की असली मुक्ति
के प्रश्न उसकी देह से जुड़े हैं ,लेकिन वर्तमान मीडिया की मंडी में स्त्री
की 'देह मुक्ति' के प्रश्नों को 'मुक्त देह' के रूप में हल किया जा रहा है
।चाहे -अनचाहे , आवश्यक - अनावश्यक सभी विज्ञापनों, कार्यक्रमों के केंद्र
में स्त्री की 'मुक्त देह' को ही मंच से परोसा जा रहा है । दुर्भाग्य की
बात यह है कि हर नाटक , विज्ञापन , फिल्म , समाचार को बेचने का जरिया
स्त्री ही है । स्त्री को प्रोडक्ट के रूप में इस्तेमाल करने वाला मीडिया
उसकी 'मुक्त देह' को परोस कर 'देह मुक्ति' का वादा और दावा कर रहा है ।
तमाम सीरियलों में महिलाओं को खलनायिका बनाकर प्रस्तुत किया जा रहा है और
फिर उनकी उन्ही छवियों को केंद्र में रख कर उन पर विभिन्न विश्वविद्यालयों
में महिला सशक्तिकरण के नाम पर शोध हो रहे हैं ।
वस्तुतः स्त्री अस्मिता के
बुनियादी सवाल आधी आबादी के वे बुनियादी सवाल हैं जिन पर पूरी मनुष्यता को
सम्पूर्ण संवेदनशीलता, संजीदगी और संयम से सोचने-विचारने और कार्यान्वयन
की आवश्यकता है ।

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